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हम धन्य हैं कि हमें ऐसा रोड मिला है,हम पैदल नहीं, उड़कर जाते हैं स्कूल
- दैनिक लोक भारती
- 01 Sep, 2026
800 मीटर सड़क पर छात्राओं का तंज, विकास के दावों पर सवाल
हेमन्त कुमार श्रीवास्तव
श्रावस्ती । जिले के हरिहरपुर ब्लॉक क्षेत्र के जोगनी खर्च गांव में राजकीय बालिका हाईस्कूल तक पहुंचने वाला करीब 800 मीटर रास्ता बरसात में बदहाल हो गया है। कीचड़, पानी और फिसलन से भरे इस रास्ते से होकर छात्राओं और शिक्षकों को रोजाना स्कूल पहुंचना पड़ रहा है।
सड़क की हालत को लेकर छात्राओं में नाराजगी है। छात्राओं ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा, हम धन्य हैं कि हमें ऐसा रोड मिला है। हम पैदल स्कूल नहीं जाते, उड़कर जाते हैं। हमारे अध्यापक भी हेलीकॉप्टर से आते होंगे।” छात्राओं का यह तंज विकास के सरकारी दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़ा कर रहा है।बताया जा रहा है कि करीब 10 वर्षों से बरसात के मौसम में विद्यालय तक पहुंचने वाला यह रास्ता बेहद खराब हो जाता है। बारिश होते ही रास्ते पर कीचड़ और पानी भर जाता है।
हालात ऐसे हो जाते हैं कि शिक्षकों को अपने वाहन विद्यालय से काफी पहले खड़े करने पड़ते हैं और इसके बाद उन्हें पैदल कीचड़ भरे रास्ते से होकर स्कूल पहुंचना पड़ता है। छात्राओं को भी इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है, जिससे फिसलकर गिरने और चोटिल होने का खतरा बना रहता है।स्थानीय लोगों के मुताबिक यह विद्यालय राप्ती नदी के किनारे बसे और बाढ़ प्रभावित कई गांवों की बेटियों के लिए महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान है। करीब एक दर्जन गांवों से छात्राएं यहां पढ़ने आती हैं।
ऐसे में विद्यालय तक पहुंचने वाले रास्ते की बदहाली केवल आवागमन की समस्या नहीं, बल्कि बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा भी है। छात्राओं का कहना है कि रास्ते की परेशानी के कारण कई बेटियां स्कूल आने-जाने में परेशान होती हैं और कुछ छात्राएं पढ़ाई छोड़ने तक को मजबूर हो सकती हैं।
छात्राओं ने जिलाधिकारी अन्नपूर्णा गर्ग से बनवाने की अपील-
उनका कहना है, जान है तो जहान है।”छात्राओं ने जिलाधिकारी अन्नपूर्णा गर्ग से मामले का संज्ञान लेकर विद्यालय तक सड़क बनवाने की अपील की है। उनका कहना है कि प्रशासन चाहे तो महज 800 मीटर रास्ते की समस्या का स्थायी समाधान किया जा सकता है।
वहीं, ग्रामीणों और स्थानीय लोगों की ओर से जनप्रतिनिधियों से भी सवाल किए जा रहे हैं कि जब शिक्षा के मंदिर तक पहुंचने वाला रास्ता ही बदहाल है तो विकास के दावों की जमीनी हकीकत क्या है।अब देखने वाली बात यह होगी कि छात्राओं की यह आवाज प्रशासन और जनप्रतिनिधियों तक कब पहुंचती है और करीब एक दशक से बदहाल पड़े इस 800 मीटर रास्ते की तस्वीर कब बदलती है।
ये कैसा विकास है-
ये कैसा विकास है, जहां देश के भविष्य कहे जाने वाले छात्राओं के विद्यालय जाने के मार्ग पर कीचड़ भरा है। जहां अधिकारी जान कर भी चुप्पी साधे हुए हो। शायद वे इस कचड़े में पड़ना नहीं चाहते हो, उन्हें कौन सा स्कूल जाना है।
जिन्हें जाना है यह उनकी समस्या है, शायद यही सोच कर आधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से दूरी बनाए हुए हैं।सच बताना उचित होगा प्रदेश सरकार के विकास कार्यों में विभागीय उदासीनता सबसे बड़ी बाधा है। जिसका खामियाजा स्थानीय लोगों या फिर देश के भविष्य कहे जाने वाले छात्र को झेलना पड़ता है।
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